कैसे मनाई जाती है बंगाल में दुर्गा पूजा

बंगाल  में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में से दुर्गा पुजा सबसे भव्य है। हालांकि माँ दुर्गा की पूजा भारत के कई हिस्सों में होती है, लेकिन जिस शान से दुर्गा पूजा कोलकाता और बंगाल के अन्य भागों में मनाई जाती है, उसकी कोई तुलना ही नहीं है।

नवरात्रि के छठे दिन से शुरू होकर नौवें दिन तक, देवी दुर्गा की भव्य मूर्तियों वाले पंडाल आगंतुकों के लिए खुले रहते हैं। दसवें दिन, जिसे दशमी के रूप में भी जाना जाता है, भव्य उत्सव और जुलूस के साथ मूर्ति का विसर्जन होता है।

दुर्गा पूजा की विस्तृत जानकारी
दुर्गा पूजा का उत्सव लगातार पाँच दिनों तक चलता है: षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी।

षष्ठी

षष्ठी वाले दिन देवी दुर्गा अपने चार बच्चों- लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश के साथ पृथ्वी पर उतरती हैं। इस दिन देवी की रंगीन मूर्तियों का अनावरण किया जाता है।

सप्तमी

सप्तमी दुर्गा पूजा का पहला दिन है। इस दिन प्राण प्रतिष्ठा द्वारा देवी की शक्तियों को मूर्ति में स्थापित किया जाता है।

दिन की शुरुआत “कोला बोउ”  (यहाँ केले के पेड़ को गणेशजी की दुल्हन का प्रतीक माना  जाता है) स्नान के साथ होती है – एक केले के पेड़ को, भोर से पहले, नदी या तालाब में नहलाया जाता है, साड़ी पहनाई जाती है और पांडल में ले जाकर स्थापित किया जाता है।    देवी दुर्गा के नौ दिव्य रूपों का प्रतिनिधित्व करते, नौ विभिन्न प्रकार के पौधों की पूजा की जाती है।

अष्टमी

अष्टमी दुर्गा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन देवी दुर्गा के रूप में सजी एक बालिका को अविवाहित कुंवारी लड़की के रूप में पूजा जाता है। इसे “कुमारी पूजन” कहते हैं। शाम को, देवी चामुंडा रूप में देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। अनुष्ठान पूरा होने के बाद, देवी को प्रसन्न करने के लिए, “धुनुची नाच” नामक लोक नृत्य किया जाता है।

नवमी

नवमी पूजा का अंतिम दिन है, जो  महा आरती के साथ संपन्न होता है। माना जाता है कि इस दिन देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर का वध किया था, और इसलिए वे महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजी जाती हैं। हर कोई अपने बेहतरीन, सबसे ग्लैमरस कपड़े पहनकर तैयार हो जाता है। देवी को पसंदीदा भोग (भोजन) अर्पित किया जाता है और फिर उसे भक्तों में वितरित कर दिया जाता है।

दशमी

दशमी वाले दिन देवी दुर्गा अपने पति के निवास, कैलाश पर्वत, लौट जाती हैं और मूर्तियों को एक जुलूस में गाजे-बाजे के साथ विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। देवी को अश्रुपूरित विदाई दी जाती है और उनसे अगले साल फिर से आने के लिए प्रार्थना की जाती है।

विवाहित महिलाएं देवी को लाल सिंदूर अर्पित करती हैं और एक दूसरे के चेहरे पर सिंदूर मलती हैं। विसर्जन के बाद, लोग आशीर्वाद देने और प्राप्त करने के लिए पारंपरिक पोशाकों में अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलते हैं। मिठाई बांटी जाती है और भोजन का आयोजन होता है। इस तरह दस दिनों तक चलने वाली भव्य दुर्गा पूजा का समापन होता है।

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