कैसे मनाया जाता है दशहरा

विजयदशमी, जिसको दशहरा भी कहा जाता है, हर साल नवरात्रि के अंत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू त्योहार है। अधिकांश: यह अश्विन या कार्तिक माह में मनाया जाता है। 
दक्षिणी, पूर्वी, उत्तरपूर्वी और भारत के कुछ उत्तरी राज्यों में, विजयादशमी में दुर्गा पूजा की समाप्ति होती है।  उतरी, मध्य और पश्चिमी राज्यों  में यह रामलीला के अंत को चिह्नित करता है और रावण पर भगवान राम की जीत को याद करता है। 
जिन राज्यों में दुर्गा पूजा का आयोजन होता है वहाँ विजयादशमी वाले दिन माँ दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय की मिट्टी की मूर्तियों को जुलुस के साथ नदी या समुद्र तक ले जाकर पानी में विसर्जित कर दिया  जाता है। जुलूस में संगीत, बाजे-गाजे आदि भी शामिल होते हैं। अन्यत्र, दशहरा पर बुराई के प्रतीक, रावण, के पुतलों को आतिशबाजी के साथ जलाया जाता है। विजयदशमी के साथ ही दीपावली की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं। 
कई स्थानों पर, रामलीला, या राम, सीता और लक्ष्मण की कहानी का  नौ  दिनों तक मंचन होता है। अधिकांश उत्तरी और पश्चिमी भारत में, दशहरा को राम के सम्मान में मनाया जाता है। रामायण और रामचरितमानस पर आधारित नाटक-नृत्य-संगीत (रामलीला) आदि का प्रदर्शन और आयोजन  मेलों में किया जाता है। दशहरा की शाम को राक्षस रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलों को जलाया जाता है। 
पूरे उत्तर भारत में दशहरा इसी प्रकार धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन विशेष रूप से अयोध्या, वाराणसी, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी आदि शहरों में इसकी छटा अलग ही होती है। 
छोटे-छोटे गांवों और कस्बों के समुदायों में रामलीला का नाटकीय आयोजन विभिन्न सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के दर्शकों को आकर्षित करता है। ग्रामीण लोग, विशेषकर, इन सामरोहों में शामिल होते हैं और बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।  कुछ कलाकारों की मदद करते हैं, दूसरे लोग स्टेज सेटअप, मेकअप, पुतले और रोशनी आदि में मदद करते हैं। इस तरह यह त्योहार ग्रामीण अंचलों में सामाजिक सोहार्द और मेल-मिलाप का कारण भी बनता  है। 
कैसे मनाया जाता है  दशहरा अन्य जगहों  पर
कुल्लू दशहरा हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में मनाया जाता है और अपने विश्व-विख्यात मेले के लिया जाना जाता है। अनुमानित साढ़े पांच लाख लोग, जिसमें पर्यटक भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं, इस मेले को देखने आते हैं।  आस-पास के क्षेत्रों से देवता और उनकी यात्रा वाली झांकियों का आगमन कुल्लू दशहरा की विशेषता है।
दक्षिण भारत में, विजयदशमी विभिन्न तरीकों से मनायी जाती  है। समारोह में दुर्गा की पूजा से लेकर, मंदिरों और प्रमुख किलों जैसे मैसूर के किले को रोशनियों से सजाया जाना शामिल है।
गुजरात में, इस दौरान उपवास और प्रार्थना आम है। गरबा नामक नृत्य यहाँ की विजयदशमी का प्रमुख हिस्सा है। इस  नृत्य में लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर डांडिया नृत्य करते हैं। 
बंगाल में दशहरा को बिजोय दशमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नौ दिन की दुर्गा पूजा समाप्त होती है और देवी दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की मिट्टी की मूर्तियों को विसर्जित कर अलविदा कहा जाता है। महिलाएं एक दूसरे को  सिंदूर लगाती हैं और  लाल वस्त्र पहनती हैं। लोग मिठाई और उपहार वितरित करते हैं और अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों से मिलकर विजय दशमी की शुभकामनायें देते हैं।
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