बंगाल की दुर्गा पूजा से संबन्धित कुछ अनूठी रिवाजें

बंगाल की दुर्गा पूजा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस अवसर पर सुंदर मूर्तियों से सजे पंडालों में लाखों भक्तों की भीड़ जुटती है। बंगाल में धूमधाम से मनायी जाने वाली दुर्गा पूजा से जुड़ी कुछ ऐसी अनूठी रस्में हैं, जो एक आगंतुक को विस्मय से भर सकती हैं। पुजा से जुड़े विभिन्न धार्मिन अनुष्ठान महत्वपूर्ण तो हैं, लेकिन अद्वितीय भी।आज हम आपको कुछ ऐसी ही अनोखी रस्मों के बारे में बताएँगे, जिनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है।

चोक्षु दान ( चक्षु दान )

नवरात्रि शुरू होने से पहले जब  देवी दुर्गा की मूर्तियों का निर्माण होता है, तब उन मूर्तियों को बिना आंखों के ही तैयार किया जाता है। महालया के अवसर पर, देवी को, अनुष्ठानों के साथ, पृथ्वी पर आमंत्रित किया जाता है और इसलिए इस दिन, चोक्षु दान नामक एक शुभ अनुष्ठान में मूर्ति की आँखें बनाई  जाती हैं। यह माना जाता है कि मूर्ति पर आँखें चित्रित करते  समय देवी पृथ्वी पर उतरती हैं। कुमारटुली उत्तरी कोलकाता का एक प्रसिद्ध स्थान है जहाँ अधिकांश मूर्तियाँ बनती हैं।


कोला बोउ स्नान  (केले के पेड़ वाली दुल्हन का स्नान)

कोला बोउ स्नान  का आयोजन महासप्तमी या महालया के सातवें दिन होता है । इस अनुष्ठान में, आठ अन्य पौधों के साथ, एक केले के पौधे को पीले धागे और अपराजिता पौधे की टहनियों से बांधा जाता है। यहाँ केले के पेड़ को गणेशजी की दुल्हन का प्रतीक माना  जाता है।  इसके बाद केले के पौधे को पारंपरिक लाल और सफेद रंग की साड़ी पहनाई जाती है। पत्तियों पर सिंदूर लगाया जाता है।  फिर, कोला बोउ को भगवान गणेश के दाहिने ओर रखा जाता है। कोलकाता में कोला बोउ स्नान देखने के लिए बाबूघाट सर्वोत्तम है।

नौ पौधे या नवपत्रिका माँ दुर्गा के नौ रूपों को दर्शाते हैं।

अंजलि
अंजलि पूजा के सभी दिन दी जाती है। ताजे फूल और बेल के पत्ते पुजारी द्वारा अनुयायियों को सौंप दिए जाते हैं। इसके बाद पुजारी मंत्र दोहराते हैं और मंत्रों की समाप्ती पर  फूलों को मां के चरणों में समर्पित कर दिया जाता है।


कुमारी पूजा

कुमारी पूजन महाष्टमी के शुभ दिन किया जाता है। इस अवसर पर एक अविवाहित बालिका को मां के कुमारी रूप के प्रतीक में पूजा जाता है। इस अनुष्ठान को देखने की सबसे अच्छी जगह बेलूर मठ है। बच्ची को पवित्र पानी में नहलाया जाता है, साड़ी पहनाई जाती है और आभूषणों से सजाया जाता है। इसके बाद पुजारी बालिका की वैसे ही पूजा करते हैं, जैसे वे मां की करते हैं।

संधि पूजा

संध्या पूजा महाष्टमी और महानवमी के मोड़ पर होती है। यह ठीक उस क्षण को दरसाता है  जब मां दुर्गा ने चंड और मुंड को मारने के लिए देवी चामुंडा का रूप धारण किया था। पूजा के दौरान 108 दीप जलाए जाते हैं और ढाक बजाए जाते हैं।


धुनुची नाच

धुनुची ’एक विशिष्ट मिट्टी का बर्तन है, जिसमें सूखे नारियल की भूसी और सुगंधित सामग्री के साथ देवी को धुआँ दिया जाता है। पुरुष इसे हाथ में पकड़ते हैं और मां दुर्गा के सामने ढाक की ताल पर थिरकते हैं। धुनुची से निकलने वाला धुआँ और ढाक की ताल पर नाचता हुआ भक्त  एक अनूठा वातावरण का निर्माण करते हैं।

सिंदूर खेला

महादशमी पर सिंदूर खेला के दौरान विवाहित महिलाएं पारंपरिक लाल –सफ़ेद साड़ी पहनती हैं, देवी दुर्गा को मिठाई अर्पित करती हैं और मां दुर्गा और एक-दूसरे को सिंदूर का लेप लगाती हैं। इस दिन आपको पांडालों के आस-पास चेहरे पर सिंदूर मली असंख्य महिलाएं नज़र आएंगी।

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