सत्यभामा और कृष्णजी की वो रोचक घटना जो विवाह में तब्दील हो गयी

सत्यभामा, जिसे सत्रजीती के नाम से भी जाना जाता है, यादव राजा सत्रजीत की बेटी थीं। इन्हे भूमी देवी का अवतार भी माना जाता है।  उन्होंने राक्षस नरकासुर को हराने में कृष्ण की सहायता भी की थी।

राजा सत्रजीत स्यामंतक नामक गहनों के रखवाले थे। उन्होंने ये गहने सूर्यदेव से हासिल किए थे। एक बार सत्रजीत के भाई प्रसेन ये गहने पहनकर शिकार करने निकल गए। इसी समय जंगल में एक शेर ने उन्हें मार डाला। इधर शेर को, रामायण के पात्र, जांबवन ने मार डाला और अपनी बेटी जांबवती को यह गहना दे दिया। जब प्रसेन वापस नहीं लौटे, तब सत्रजीत को भगवान कृष्ण पर शक हुआ और उन्होंने उन पर गहनों की खातिर प्रसेन की हत्या करने का आरोप लगा दिया।

कृष्ण, अपनी प्रतिष्ठा पर लगे दाग को हटाने के लिए, कुछ लोगों के साथ गहनों की तलाश में निकले। उन्हें गहने ऐसी गुफा में मिले जहां जाम्बवन अपनी बेटी के साथ थे। जाम्बवन ने कृष्ण को एक घुसपैठिया समझ उन पर हमला कर दिया। 28 दिनों तक जाम्बवन व कृष्ण एक-दूसरे से लड़ते रहे।

आखिरकार, जांबवन, जिनका पूरा शरीर कृष्ण की तलवार के चीरों से बुरी तरह ज़ख्मी हो गया था, ने श्री कृष्ण को राम के रूप में पहचान लिया और उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया। जाम्बवान ने कृष्ण को गहने दे दिये और साथ ही, विवाह में अपनी बेटी जाम्बवती को भी स्वीकार करने की प्रार्थना की, जिसे भगवान ने स्वीकार कर लिया।

जब भगवान कृष्ण ने सत्रजीत को गहना लौटाया तो सत्रजीत को अपनी भूल पर पछतावा हुआ और उन्होंने श्री कृष्ण से माफी मांगी। उन्होंने कृष्णजी से अपनी बेटी सत्यभामा से शादी करने की पेशकश की। श्री कृष्ण ने शादी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, लेकिन गहना लेने से मना कर दिया।

भगवान कृष्ण से सत्यभामा के 10 पुत्र हुए – भानु, स्वभानु, सुभानु, भानुमान, प्रभाणू, अतीभानु, प्रतिभाभानु, श्रीभानु, बृधभानु, और चंद्रभानु। किंवदंतियों और लोककथाओं के अनुसार, उनके सबसे बड़े बेटे भानु का विवाह युधिष्ठिर और द्रौपदी की बेटी सुथानु के साथ हुआ था। 

नरकासुर की मृत्यु और सत्यभामा की भूमिका

एक बार श्री कृष्ण और दानव नरकासुर के बीच एक भयानक युद्ध हुआ। दानव ने श्रीकृष्ण पर एक शक्ति का प्रहार किया, जिससे भगवान कृष्ण बेहोश हो गए। इस युद्ध में सत्यभामा भी श्री कृष्ण के साथ थी। अपने पति को बेहोश देख  सत्यभामा क्रोधीत हो गईं और उन्होंने नरकासुर पर तीरों से हमला कर दिया। सत्यभामा और कृष्ण ने मिलकर इस युद्ध में नरकासुर को मार डाला।

कहा जाता है कि सत्यभामा भूदेवी की अवतार थीं और नरकासुर को ब्रहमाजी का आशीर्वाद था कि वो केवल अपने माँ के हाथों ही मारा जाएगा। क्योंकि नरकासुर भूमि देवी का पुत्र था, इसलिए ब्रहमाजी द्वारा दिया गया वरदान इस तरह फलित हुआ।    

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