क्या है ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव का महत्त्व

शनि भगवान (जिन्हें शनि देव, शनि महाराज, और छायापुत्र के नाम से भी जाना जाता है), हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। शनिदेव अपशकुन और प्रतिशोध के लिए जाने जाते हैं, और यह माना गया है कि शनि की प्रार्थना करने से मनुष्य को व्यक्तिगत बाधाओं को दूर करने में मदद मिलती है।

शनि नाम मूल रूप से “शनिश्चरा” शब्द से आया है, जिसका अर्थ है धीमी गति से चलने वाला (संस्कृत में, “शनि” का अर्थ है “ग्रह शनि” और “चर” का अर्थ है “गति”।

शनिदेव का चित्रण
हिंदू आइकॉनोग्राफी में, शनि को रथ पर सवार एक काले व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। उनका रथ बहुत धीमी गति से आकाश में बढ़ता है। वह विभिन्न हथियारों, जैसे तलवार, एक धनुष और दो तीर, एक कुल्हाड़ी, और / या एक त्रिशूल लेकर चलते हैं और गिद्ध या कौवे पर सवार होते हैं। अक्सर गहरे नीले या काले रंग के कपड़े पहने, वे नीले रंग का फूल और नीलम धारण करते हैं।

शनि को कभी-कभी एक पाँव से लंगड़ा दिखाया जाता है। कहा जाता है कि बचपन में अपने भाई यम के साथ लड़ाई के कारण उनकी यह दशा हो जाती है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि की प्रकृति वात या हवादार है; उनका रत्न नीलम और कोई भी काले रंग का पत्थर है। उनकी धातु सीसा है। उनकी दिशा पश्चिम है, और शनिवार उनका दिन है।

शनि को माना जाता है क्रूर ग्रह
वैदिक ज्योतिष में, शनि नौ ग्रहों में से एक हैं। प्रत्येक ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहू और केतू ) भाग्य के एक अलग पहलू पर प्रकाश डालते हैं।  किसी भी मनुष्य के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति उसके भविष्य को निर्धारित करती है; माना जाता है कि शनि ग्रह के तहत पैदा होने वाले व्यक्ति को दुर्घटनाओं, अचानक विफलताओं, और धन और स्वास्थ्य समस्याओं का अक्सर सामना करना पड़ता है। शनिदेव इंसान को उसके कर्मों का फल देने के लिए जाने जाते हैं। वे मनुष्य को उसके जीवनकाल में किए गए अच्छे या बुरे कामों का फल प्रदान करते हैं। मनुष्य अच्छे कर्मों के द्वारा अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर कर सकता है।
शनि ग्रह लगभग सभी ग्रहों की तुलना में सबसे अधिक धीमा है और किसी भी राशि चक्र में ढाई वर्षों के लिए रहता है। शनि का सबसे शक्तिशाली स्थान सातवाँ घर है; शनि वृष और तुला राशि के जातकों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है।

शनि की साढ़े सती
हिंदुओं में, साढ़े साती साढ़े सात साल की एक कठिन अवधि मानी गयी है। शनि एक राशि से दूसरी तक पहुँचने में ढाई वर्ष का समय लेता है। गोचर करते हुए जब शनि व्यक्ति की जन्म राशि या नाम की राशि में पहुंचता है, तब वह राशि, उससे अगली राशि और बारहवीं स्थान वाली राशि पर साढ़े साती का प्रभाव होता है।

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Aaradhi

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