उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर

उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भारत के 12 लोकप्रिय ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग मंदिर है। यह इंदौर शहर के पास मध्य प्रदेश राज्य के अंतर्गत आता है, जिसे धार्मिक यात्रा के लिए भारत में हरिद्वार और वाराणसी के बाद तीसरा सबसे दिव्य स्थान माना जाता है।

महाकालेश्वर मंदिर की महिमा का वर्णन विभिन्न पुराणों में किया गया है। उज्जैन शहर में स्थित लगभग सभी मंदिरों की अपनी पौराणिक लोक कथाएँ हैं और प्रत्येक मंदिर के साथ एक अनोखी कहानी जुड़ी हुई है।

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उज्जैन भारतीय समय की गणना के लिए केंद्रीय बिंदु हुआ करता था और महाकाल को उज्जैन का विशिष्ट पीठासीन देवता माना जाता था। महाकालेश्वर का मंदिर, अपनी भव्यता और दिव्यता के कारण, यहाँ आनेवाले लाखों श्रद्धालुओं में  विस्मय और भक्ति पैदा करता है।

क्या है महाकालेश्वर मंदिर की विशिष्टता

इस मंदिर में भगवान शिव एक लिंग के रूप में बसे हुए हैं और सर्व प्रकार के दुखों और कष्टों से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर न केवल अपने अतुलनीय लिंगम के लिए विश्व-विख्यात है, बल्कि उज्जैन का यह मंदिर  काल सर्प दोष निवारण के लिए भी जाना जाता है।

मंदिर में स्थापित महाकालेश्वर की मूर्ति दक्षिणमुखी है, यानि कि इसका मुख  दक्षिण की ओर है। यह एक अनूठी विशेषता है क्योंकि 12 ज्योतिर्लिंगों में से केवल इसी मंदिर की मूर्ति दक्षिणमुखी है। ओंकारेश्वर महादेव की मूर्ति महाकाल मंदिर के ऊपर गर्भगृह में प्रतिष्ठित है। गर्भगृह के पश्चिम, उत्तर और पूर्व में गणेश, पार्वती और कार्तिकेय के चित्र स्थापित हैं। दक्षिण में भगवान शिव के वाहन नंदी की प्रतिमा है। तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर की मूर्ति केवल नाग पंचमी के दिन दर्शनों के लिए खुलती है।

पौराणिक किंवदंतियों के अनुसार मंदिर के पीठासीन देवता भगवान शिव स्वयंभू हैं  और उनके भीतर असीम शक्ति है। जहां अन्य लिंगों को मंत्र-शक्ति के साथ औपचारिक रूप से स्थापित किया जाता है, वहीं यहाँ महाकाल ने खुद ही स्वयं को प्रकट किया।

यह मंदिर 18 महाशक्ति पीठों में से एक के रूप में भी प्रतिष्ठित है।
शक्तिपीठों के बारे में मान्यता है कि देवी सती के शव के हिस्सों के गिरने के कारण इन पीठों की स्थापना हुई थी। कहा जाता है कि सती देवी के ऊपरी होंठ महाकालेश्वर के उज्जैन मंदिर में गिरे थे।
महाकालेश्वर उज्जैन मंदिर में भस्म आरती
हर सुबह 4 बजे, मंदिर में भस्म आरती महत्वपूर्ण पारंपरिक समारोहों के साथ की जाती है। अनुष्ठान की शुरुआत जलभिषेक से होती है; सबसे पहले लिंग को जल, दूध, शहद और दही से स्नान करवाया जाता है। दिन की पहली आरती करने से पहले इसे चंदन और हल्दी के लेप, बेल के पत्तों और फूलों से सजाया जाता है।

अधिकांश मंदिरों में पाई जाने वाली पवित्र राख के विपरीत, अतीत में, महाकाल भस्म आरती के लिए रात में अंतिम संस्कार की गई चिता की भस्म या राख की आवश्यकता होती थी। आज, प्रथा बदल गई है और मंदिर के अधिकारी गाय के गोबर से ताजा राख तैयार करते हैं और इसे श्रृंगार के लिए प्रयोग करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि महाकाल इंसान को मोक्ष प्राप्त करने और जन्म और पुनर्जन्म के अंतहीन चक्र से मुक्ति पाने में मदद करते हैं। इसीलिए राख का उपयोग पापों को धोने, और परमात्मा से जुड़ने के प्रतीक के रूप में किया जाता है।

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