क्यों है हिंदुओं में बनारस नगरी का इतना महत्त्व

दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक, वाराणसी, को भारत की धार्मिक राजधानी भी कहा जाता है। यह पवित्र नगरी उत्तर प्रदेश राज्य के दक्षिणपूर्वी भाग में, गंगा नदी के बाएं किनारे पर स्थित है और हिंदुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है।

काशी,  नाम से भी मशहूर यह नगरी न केवल एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, बल्कि संगीत, साहित्य, कला और शिल्प में अपनी विरासत के लिए जाना जाने वाला एक महान केंद्र भी है। बनारस शहर रेशम बुनाई का सबसे प्रमुख केंद्र है। यहां निर्मित बनारसी सिल्क साड़ियां और ब्रोकेड दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

शास्त्रीय संगीत यहाँ के लोगों की जीवन शैली का अभिन्न अंग है। कई सुप्रसिद्ध संगीत घरानों का जन्म यहाँ हुआ है।  कई धार्मिक ग्रंथ और थियोसोफिकल ग्रंथ भी यहां लिखे गए हैं।

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बनारस को धार्मिक और पवित्र क्यों माना गया है

हिंदुओं के लिए, गंगा एक पवित्र नदी है, और इसके तट पर बसा कोई भी शहर पवित्र माना जाता है। लेकिन वाराणसी की एक और विशेषता भी है, पौराणिक कथाओं के अनुसार यह नगरी भगवान शिव की बनाई, बसाई हुई है।  

कई महान विभूतियों और पौराणिक पात्रों के साथ भी इस जगह का संबंध है।  वाराणसी को बौद्ध धर्मग्रंथों के साथ-साथ हिंदू महाकाव्य महाभारत में भी जगह मिली है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखित श्री रामचरितमानस भी यहाँ लिखा गया था।

हजारों तीर्थयात्रिय हर साल आध्यात्म की खोज में यहाँ आते हैं। लाखों ऐसे भी हैं जिनका यह विश्वास है कि यहाँ शरीर त्यागने से पाप से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। हिंदुओं का मानना ​​है कि गंगा के तट पर मरना जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति का आश्वासन है। इसलिए, कई हिंदू अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वाराणसी चले आते हैं।

मंदिरों का शहर
वाराणसी अपने प्राचीन मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है। भगवान शिव को समर्पित प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में मौजूद शिवलिंग पप्राचीनतम शिवलिंगों में से एक माना जाता है। कासिकंद द्वारा लिखित स्कंद पुराण में शिव के निवास के रूप में वाराणसी के इस मंदिर का उल्लेख है।

वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण इंदौर की शासक रानी अहल्या बाई होल्कर ने 1776 में करवाया था। इसके बाद 1835 में लाहौर के सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह ने 51 फीट ऊँचे इसके शिखर को सोने में मढ़वाया था। तब से इसे स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा, वाराणसी में कई अन्य प्रसिद्ध मंदिर भी हैं।
रामनगर पांडव मार्ग पर स्थित 8 वीं सदी का दुर्गा मंदिर, पास के पेड़ों में रहने वाले सैकड़ों बंदरों का घर है।

एक और लोकप्रिय मंदिर संकटमोचन मंदिर है, जो हनुमानजी को समर्पित है।

वाराणसी का भारत माता मंदिर शायद भारत का एकमात्र मंदिर है जो ‘भारत माता’ को समर्पित है। 1936 में महात्मा गांधी द्वारा इसका उद्घाटन किया गया था।  इसमें संगमरमर में नक्काशी किया हुआ भारत का एक बड़ा मानचित्र है।

एक और अपेक्षाकृत नया मंदिर 1964 में भगवान राम के सम्मान में बनाया गया तुलसी मानस मंदिर है, जहाँ तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की थी। इस मंदिर की दीवारें भगवान राम की कथाओं को दर्शाती दृश्यों और छंदों से सजी हैं।
पूजा के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों में भगवान गणेश के साक्षी विनायक मंदिर, काल भैरव मंदिर, नेपाली मंदिर,  पंचगंगा घाट के पास बिंदू माधव मंदिर और तैलंग स्वामी मठ शामिल हैं।

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