जगन्नाथ पुरी रथयात्रा से जुड़ी हैरतअंगेज कथा

जगन्नाथ पुरी मंदिर तीन देवताओं की प्रतिमाओं वाला विश्व का एकमात्र मंदिर है। साथ ही, यह एकमात्र मंदिर है जहां भगवान कृष्ण अपने भाई-बहन- बलराम और सुभद्रा के साथ विराजमान हैं।

पूरी की जगन्नाथ रथ यात्रा की उत्पत्ति से जुड़ी कुछ आश्चर्यजनक पौराणिक कहानियां मौजूद हैं, जो क्षेत्र के लोगों की सामाजिक व धार्मिक सोच और विश्वास को दर्शाती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:
भगवान कृष्ण और बलराम को मारने के लिए, उनके मामा, कंस ने उन्हें मथुरा आमंत्रित किया। उसने अक्रूर को एक रथ के साथ गोकुल भेजा। भगवान कृष्ण, बलराम के साथ रथ पर बैठ मथुरा के लिए रवाना हुए। प्रस्थान के इस दिन को भक्त रथ यात्रा के रूप में मनाते हैं। रथयात्रा उस दिन का प्रतीक है जब भगवान कृष्ण ने, कंस को मारकर, मथुरा वासियों को भाई बलराम के साथ रथ में दर्शन दिए।
एक और कथा के अनुसार, द्वारिका में भक्तोंजगन्नाथ पुरी रथयात्रा ने उस दिन जश्न मनाया जिस दिन भगवान कृष्ण बलराम और सुभद्रा को शहर का वैभव दिखाने रथ पर सवार हुए।
रथयात्रा से जुड़ी एक और कथा बताती है कि भगवान कृष्ण के शरीर के दाह- संस्कार के बाद क्या हुआ।
जब श्री कृष्ण का द्वारिका में अंतिम संस्कार किया जा रहा था  तो बलराम  दुखी होकर, कृष्ण के आंशिक शव को लेकर खुद को समुद्र में डुबोने के लिए निकल पड़े। उनके पीछे-पीछे सुभद्रा भी थीं। उसी समय, भारत के पूर्वी तट पर, जगन्नाथ पुरी के राजा इंद्रद्युम्न ने सपना देखा कि भगवान का शरीर पुरी के तटों तक तैर आएगा। उन्हें नगर में कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियों का निर्माण करवाकर भगवान कृष्ण की अस्थियों को मूर्ति की पीठ के खोखले में रखना चाहिए। सपना सच हो गया। राजा को अस्थियों के कुछ टुकड़े मिल गए और उन्होंने उन्हें उठा लिया। लेकिन सवाल यह था कि मूर्तियों का निर्माण कौन करेगा। यह माना जाता है कि तभी देवताओं के वास्तुकार, विश्वकर्मा, एक बूढ़े बढ़ई के रूप में वहाँ पहुंचे। उन्होंने मूर्तियों के निर्माण का प्रस्ताव राजा को दिया, पर साथ ही एक शर्त भी रख दी कि निर्माण के दौरान कोई न उन्हें टोकेगा और न ही किसी भी रूप में उन्हें परेशान करेगा। यदि किसी ने ऐसा किया तो वे काम को अधूरा छोड़ कर चले जाएँगे।
एक बंद कमरे में बढ़ई ने मूर्ति-निर्माण का काम शुरू किया। जब कुछ महीने बीत गए तब एक दिन अधीर होकर राजा इन्द्रद्युम्न ने विश्वकर्मा के कमरे का दरवाजा खोल दिया। विश्वकर्मा तुरंत गायब हो गए क्योंकि उन्होंने पहले ही चेतावनी दे दी थी। अधूरी मूर्तियों के बावजूद, राजा ने उन्हें पवित्र किया और भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र अस्थियों को खोखले में रखकर मंदिर में स्थापित किया।
हर साल, पूरी में, रथ यात्रा के दौरान तीन विशाल रथों में भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमाओं के साथ एक राजसी जुलूस निकाला जाता है। जनकपुर से मंदिर तक भक्तों द्वारा विशाल रथ खींचा जाता है। मूर्तियों को हर 12 साल में बदल दिया जाता है।  

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