भाई दूज का त्योहार

भाई दूज जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में, भाउ बीज, भाई टीका, भाई फोंटा आदि अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है, शुक्ल पक्ष के दूसरे चंद्र दिवस पर मनाया जाने वाला त्योहार है।

यह पर्व भी रक्षा बंधन के त्योहार की ही तरह भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को उपहार देती हैं। भाई भी अपनी बहनों को उपहार देते हैं।

भाई-दूज-का-त्योहार

देश के दक्षिणी भाग में, इस दिन को यम द्वितीया के रूप में मनाया जाता है। कायस्थ समुदाय में, दो भाई दूज मनाए जाते हैं। इनमें से जो ज़्यादा लोकप्रिय है, वह दीवाली के दूसरे दिन मनाया जाता  है और जो कम प्रचलित है, वह होली के एक या दो दिन बाद मनाया जाता है।

भारत के विभिन्न हिस्सों में भाई दूज कैसे मनाया जाता है

भारत के पूरे उत्तरी भाग में भाई दूज, दीपावली त्योहार के दौरान मनाया जाता है। यह उत्तर प्रदेश में अवधियों द्वारा व्यापक रूप से मनाया जाता है।

बंगाल में भाई फोंटा के नाम से मनाया जाता है और यह हर साल काली पुजा के दूसरे दिन होता है।

भाऊ बीज – महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात के राज्यों में मराठी, गुजराती और कोंकणी-भाषी समुदायों के बीच यह पर्व भाऊ बीज के नाम से जाना जाता है।

इस त्योहार के दिन, बहनें अपने भाइयों को उनके पसंदीदा व्यंजन / मिठाई सहित  शानदार भोजन के लिए आमंत्रित करती हैं। पूरा समारोह अपनी बहन की रक्षा के लिए भाई के कर्तव्य को दर्शाता है।  साथ ही, भाई के लिए बहन का प्रेम और आशीर्वाद भी दिखाता है।

पारंपरिक शैली में समारोह को आगे बढ़ाते हुए, बहनें अपने भाई कीआरती करती हैं और भाई के माथे पर लाल टीका लगाती हैं। इस अवसर पर  टीका समारोह पर भाई की लंबी और खुशहाल जिंदगी के लिए बहन प्रार्थना करती है। बदले में, बड़े भाई अपनी बहनों को आशीर्वाद देते हैं और उन्हें उपहार या नकद रुपये भी देते हैं।

हरियाणा और महाराष्ट्र में जिन महिलाओं के भाई नहीं होते, वे भाऊ बीज के शुभ अवसर पर चंद्रमा की पूजा करती हैं।

जिस बहन का भाई उससे बहुत दूर रहता है और उसके घर नहीं जा सकता, वह अपने भाई की लंबी और खुशहाल ज़िंदगी के लिए चाँद देवता से प्रार्थना करती है। वह चंद्रमा की आरती करती है। यही कारण है कि बच्चे प्यार से चंद्रमा को चंदामामा कहते हैं।  

भाई दूज क्यों मनाया जाता है

एक लोकप्रिय हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, दुष्ट राक्षस नरकासुर का वध करने के बाद, भगवान कृष्ण अपनी बहन सुभद्रा से मिलने गए। सुभद्रा ने,  गर्मजोशी से, मिठाई और फूलों के साथ श्री कृष्ण का स्वागत किया। उन्होंने कृष्ण के माथे पर स्नेहपूर्वक तिलक भी लगाया। कुछ लोग इसी घटना को इस  त्योहार का मूल मानते हैं।

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