रक्षा बंधन कैसे मनाते हैं?

रक्षा बंधन देश भर में मनाया जाने वाला एक लोकप्रिय त्योहार है। जाति और पंथ को भूलकर सभी क्षेत्रों के लोग इस उत्सव में भाग लेते हैं। यह श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।

यह त्योहार विभिन्न राज्यों में राखी पूर्णिमा, नारियाल पूर्णिमा और कजरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इसे भिन्न-भिन्न तरह से मनाया जाता है।

रक्षा बंधन कैसे मनाते हैं?

इस त्योहार के अवसर पर बहनें आम तौर पर अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी कलाई पर राखी नामक पवित्र धागा बांधती हैं, आरती करती हैं और उनके अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं। प्रेम और उदात्त भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इस धागे को ‘रक्षा बंधन’ कहा जाता है जिसका अर्थ है ‘सुरक्षा का बंधन’। बदले में भाई अपनी बहन को उपहार देता है और उसकी देखभाल करने का वचन देता है।

रक्षा बंधन का महत्व

रक्षा बंधन की अवधारणा मुख्य रूप से सुरक्षा की है। अक्सर हम देखते हैं कि लोग मंदिरों में पुजारियों के पास जाकर अपने हाथों में एक पवित्र धागा बंधवाते  हैं। वाराणसी में काल भैरव मंदिर से लेकर जम्मू के श्री वैष्णोदेवी मंदिर में, लोगों को पूजा करने के बाद अपने हाथों पर पवित्र धागा बांधते हुए पाए जाते  हैं।

हिंदू धार्मिक कार्यों में हम पुजारी को पुजा शुरू होने से पहले अनुष्ठान करवाने वाले भक्त की कलाई पर धागा बांधते हुए देखते हैं। यह माना जाता है कि यज्ञोपवीतम् (पवित्र धागा) पहनने वाले की रक्षा करता है।  

राखी बांधना भाई-बहन तक ही सीमित नहीं है। यह एक पत्नी द्वारा अपने पति से, या एक शिष्य द्वारा गुरु को भी बांधा जा सकता है।

पौराणिक संदर्भ

इंद्र – सची देवी : भविष्य पुराण के अनुसार, जब इन्द्र वृत्र नामक असुर के हाथों हार का सामना कर रहे थे, तब देव गुरु बृहस्पति ने देवों के राजा इंद्र को राक्षसों से सुरक्षा पाने के लिए राखी पहनने की सलाह दी थी। तदनुसार साची देवी (इंद्र की पत्नी) ने इंद्र को राखी बांधी।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, राखी का उद्देश्य समुद्र-देवता वरुण की पूजा करना था। आमतौर पर मछुआरे, समुद्र देवता, वरुण को नारियल और राखी चढ़ाते हैं – इस त्योहार को नारियाल पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है।

ऐतिहासिक संदर्भ

ऐसा कहा जाता है कि जब सिकंदर को पंजाब के महान हिंदू राजा पुरुषोत्तम ने हरा दिया, तो सिकंदर की पत्नी ने अपने पति की जान बचाने के लिए पुरुषोत्तम को राखी बांधी थी।

यह माना जाता है कि, सम्राट हुमायूँ के शासन काल के दौरान, रानी कर्णावती (चित्तौड़ की रानी) ने बहादुर शाह से सुरक्षा पाने के लिए सम्राट हुमायूँ को राखी भेजी थी। बहादुर शाह चित्तौड़ पर आक्रमण करने वाले थे। एक अन्य धर्म का होने के बावजूद, हुमायूँ रानी कर्णावती की मदद के लिए दौड़ पड़े।

राखी का संदेश

रक्षा बंधन प्यार, देखभाल और सम्मान के बेजोड़ बंधन का प्रतीक है। लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य में राखी का त्योहार सार्वभौमिक भाईचारे का संदेश देता है। इस प्रकार राखी का एक सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व है।

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