वारालक्ष्मी व्रतम – दक्षिण का एक प्रसिद्ध पर्व

वारालक्ष्मी व्रतम एक लोकप्रिय हिंदू त्योहार है जो धन और समृद्धि की देवी, लक्ष्मी, को समर्पित है। यह विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों- कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में, श्रावण पूर्णिमा से पहले शुक्रवार को मनाया  जाता है।

वारालक्ष्मी व्रतम – दक्षिण का एक प्रसिद्ध पर्व

वारालक्ष्मी व्रतम विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति और परिवार के सदस्यों की सुख-शांति के लिए किया जाता है। इस दिन की जाने वाली देवी वारालक्ष्मी की पूजा अष्टलक्ष्मी पूजा के समान फलदायक मानी जाती है। हिन्दू धर्म में आठ प्रकार की शक्तियों का वर्णन मिलता है- धन (श्री), पृथ्वी (भू), विद्या (सरस्वती), प्रेम (प्रीति), यश (कीर्ति), शांति (शांति), सुख (तृप्ति) और शक्ति (पुष्टि)। इनमें से प्रत्येक शक्ति को ‘लक्ष्मी’ का स्वरूप माना जाता है।

संयुक्त सभी आठ शक्तियों को अष्ट लक्ष्मी या आठ लक्ष्मी कहा जाता है और उनके नाम इस प्रकार हैं:

  • आदि लक्ष्मी (रक्षक)
  • धन लक्ष्मी (धन की देवी)
  • धैर्य लक्ष्मी (साहस की देवी)
  • सौभाग्य लक्ष्मी (समृद्धि की देवी)
  • विजया लक्ष्मी (जय की देवी)
  • धान्य लक्ष्मी (पोषण की देवी)
  • संतान लक्ष्मी (संतान की देवी)
  • विद्या लक्ष्मी (बुद्धि की देवी)

व्रत कथा

कहते हैं, कुंडिन्यपुरा नाम के एक नगर में चारुमथी नामक एक अत्यंत पवित्र और धर्मनिष्ठ गृहिणी रहा करती थी। उसकी दृढ़ता और सद्गुणों से प्रसन्न होकर, एक बार महालक्ष्मी ने उसे सपने में दर्शन दिए और उसे वारालक्ष्मी व्रतम का पालन करने का निर्देश दिया। चारुमथी ने पूरी तैयारी की, अपने पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों को आमंत्रित किया और दिये हूए निर्देशों का पालन करते हुए पूजा की, जिससे उसे बहुत लाभ हुआ और उसके दुख दूर हुए।

पूजा विधि

इस अवसर पर, महिलाएं देवी लक्ष्मी की पूजा अत्यंत भक्ति के साथ करती हैं। देवता का प्रतिनिधित्व करते हुए, एक कलश को साड़ी, फूलों और सोने के गहनों के साथ सजाया जाता है।

पूजा के बाद महिलाओं की कलाई पर एक रक्षासूत्र (पवित्र धागा) बांधा जाता है। यह सुरक्षा और धर्मनिष्ठा को दर्शाने के लिए पहनाया जाता है, और अतिथि महिलाओं को कई उपहार भी दिये जाते हैं।

कुछ महिलाएं इस दिन केवल पानी के साथ उपवास करती हैं तो कुछ फल और दूध लेकर भी व्रत का पालन करती हैं।

आप एक लक्ष्मी मंदिर में जाकर प्रार्थना कर सकती हैं। यदि कोई मंदिर आसपास न हो तो आप अपने घर पर सुबह देवी लक्ष्मी की पूजा कमल, गुलाब, फल, धूप आदि से करें।

कुछ लोग इस दिन योग्य ब्राह्मणों द्वारा महालक्ष्मी पूजा भी करवाते हैं। पूजा में कलश स्थापन, पंचांग स्थापन (गौरी गणेश, पुण्यवचन, षोडश मातृका, नवग्रह, सर्वतोभद्र), 64 योगिनी पूजन, क्षेत्रपल पूजन, स्वस्ति वचन, संकल्प, गणेश पूजन और अभिषेक, नवग्रह पूजा, आदि शामिल हैं। इसके अलावा कलश पूजा, लक्ष्मी मूर्ति अभिषेक और पूजन, लक्ष्मी यंत्र पूजा, लक्ष्मी स्तोत्रम का पाठ, कनकधारा स्तोत्र का पाठ, लक्ष्मी मंत्र जाप, लक्ष्मी होम, आरती और पुष्पांजलि आदि के द्वारा भी माता लक्ष्मी को प्रसन्न किया जाता है।

दक्षिण भारत में कई महिलाएं इस पारंपरिक त्यौहार का पालन कर वारालक्ष्मी से अपने परिवार के कल्याण के लिए आशीर्वाद मांगती हैं।  

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